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दस्तक...... ज़िन्दगी गुज़र रही थी ऐसी कि जैसी हम चाहते ना थे। हंस-बोल रहे थे हम, खा-पी भी रहे थे हम। मगर कुछ अंदर का डर जो बाहर भी दिख रहा था। और फिर हम इंतेज़ार करने लगे किसे ऐसे का जो हमारी मुश्किल को दूर कर दे। और फिर तुम्हारे आने की आहट सुनाई दी। और हम इन्तेज़ार करने लगे तुम्हारी दस्तक का। क्योंकि तुम्हारी आहट हमको मिल गयी थी की तुम आने वाले हो। पता नहीं क्यों तुम्हारा ख्याल आते ही एक खुशी एक उम्मीद मन में जाग जाती थी। ज़िन्दगी में बहुत सारी परेशानी थी मगर कुछ आसानी भी थी। ज़िन्दगी बहुत अच्छी तो नहीं मगर बुरी भी नहीं गुज़र रही थी। हम सब साथ रहे थे। मगर एक खालीपन था। और फिर तुम्हारी वह आहट। हम तुम्हें अपने पास बुलाना चाहते थे। हम तुम्हारे साथ रहना चाहते थे। हम जीना चाहते थे तुम्हारे साथ। मगर हम को इंतेज़ार करना था तुम्हारा। क्योंकि तुम को आने में कुछ वक्त था। और हमको उस वक्त का इंतेज़ार था जब तुम आओगे। हम तुम्हारा स्वागत बहुत धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ करना चाहते थे। मगर हम डर रहे थे। उस अनहोनी से जो पीछे हमारे साथ हो चुकी थी। हमको वह वक्त अभी भी याद ह...