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Showing posts from September, 2020

Lockdown | Lockdown Story

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  लॉकडाउन..... एक यह सदी एक वह सदी........ 👁️  कहते हैं हर ज़माना लौट के आता है। मगर ज़रा बदलाव के साथ।  🎲  फिर चाहे वह कपड़ों का हो, खाने का हो या फिर आप के किये कर्म का हो। हर वक्त लौट के आता है। यह याद दिलाने के लिए की यह काम पहले भी हो चुका है। 🗝️ अब हम जो बात कह रहे हैं वह ज़्यादा दूर की नहीं बल्कि हमारे आस-पास हो रहे कामों को देख कर कह रहे हैं। 🔐 लॉकडाउन की वजह से जब लोगों का काम धंधा लगभग बंद हो गया। अगर कुछ चल रहा था। तो वह थी खाने-पीने की दुकान जैसे-अनाज, फल, दूध, सब्ज़ी आदि। 💀 तब फिर एक दौर शुरू हुआ। इन्हीं सब चीजों की दुकान खुलने का। और फिर देखते-ही-देखते हर रोज़ हर गली मुहल्ले या यूं कह लें कि हर घर में एक दुकान खुलने लगी। और हर दूसरा आदमी फल सब्ज़ी और किराना की दुकान खोलने लगा। बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। क्योंकि इसी के साथ-साथ हर घर में पके हुए खाने, फास्ट-फूड, बिरयानी पराठों से लेकर अचार पापड़ तक का मीनू Social Networking के जरिए से सामने आने लगा। जो कि बहुत ही मुनासिब दाम में और साथ ही साथ होम डिलीवरी की सुविधा के साथ। 📈 जिन कामों को कभी हम ऐब सम...

Emoji Life | Love Life

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  इमोजी लाइफ..... यह दौर नहीं है खत का शायद Message का ज़माना है Fb और insta की कहानी है मैसेज लिखते हैं मुहब्बत का वह और कर देते हैं delete all  भी आज वह कहां और तुम कहां हर तन्हाई का साथी है यहां याद उनकी जो आ जाए कभी WhatsApp और messenger है ना बातें वह जो दिल की है हो जाती यहां अक्सर कभी voice तो कभी video call से कहने को तो हर बात ही हो जाती है मुकम्मल कहना ना यहां हम को कुछ भी ना अगर हो है रास्तें और भी इन सब के सिवा हर बात की हर सोच की हर याद की यहां हर चीज़ की हर फेस की हर काम की यहां है नाम यहां उसका Emoji कभी smiley है नाम तो इमोजी मगर काम बहुत हैं एक बात जो कहना है तो सौ रास्ते यहां हूं सोचती फिर भी मैं यह बातें अक्सर हर काम मुकम्मल है हर बात मुकम्मल करना जो कभी चाहें, बातें वह कभी मन की लफ़्ज़ों की कमी जब हो कहना भी ज़रूरी हो हो बात जो कुछ कहना कह फिर भी ना पाते हो ऐसे में इमोजी ही फिर साथ निभाता है यह सच है मुहब्बत की Emoji है बहुत लेकिन जो बात रहती है काग़ज़ पे कलम से लिख कर के वह बात नहीं लेकिन message की लिखावट में वह बात नहीं रहती इमोजी की इमोजी में वह खत...

Rickshe Wala | रिक्शे वाला | success

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  रिक्शेवाले..... कोशिश करके थक गयी वह हार के घर जा रही थी वह मन में निराशा,आंख में आंसू बोझल मन से रिक्शे पे बैठी रिक्शा चला, और आगे बढ़ा जो अपनी निराशा और थकन को भूल के वह बस तकती रह गई एक बुजुर्ग की वह मेहनत जो रिक्शा चला कर हो रही लेकिन फिर भी मेहनत वह करना उनकी मजबूरी है ऐसा कैसे सोच यह हम ले क्योंकि समझें हम मजबूरी जिसको मजबूरी को फ़र्ज़ समझ कर करना उनकी आदत है। पहुंचे जब तक हम घर तक मन की निराशा छट गई थी उम्मीदों की एक किरण को रिक्शे वाले ने जला फिर दी  कोशिश करना तब तक है कामयाबी ना मिल जाए जब तक की #Little_Star

हौसलों की उड़ान |

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  हौसलों से हारी मजबूरियां हज़ारों  बात हौसलों की जब कहीं भी होती है ज़िन्दगी आपकी आंखों में तैर जाती है   65 साल की उम्र में हौसलों को दे रही नई ऊंचाईयां कहते हैं जिनके हैसले बुलन्द होते हैं वह मुश्किलों में भी आसानियां ढूंढ लेते हैं। फिर वह मुश्किल शारिरिक हो या सामाजिक। इन्हीं हौसलों की एक मिसाल हैं नईमा जी....... नईमा जी जो किसी जमाने से इस ज़माने तक अपने हुनर को लेकर बहुत ही मशहूर हैं। बचपन से जिनको सिलाई कढ़ाई का शौक था। और उन का यह शौक सिर्फ शैक तक सीमित नहीं था। बल्कि वह बहुत ही बेहतरीन सिलाई कढ़ाई करती भी थीं।  वक्त का पहिया चलता रहा। ज़िन्दगी खुशी, दुख और आज़माईशों का सफर तय करती हुई आगे बढ़ती रही। और इन्हीं सफर में जब नईमा जी के पति को एक के बाद एक कई बिमारियों ने घेर लिया। ऐसे वक्त में नईमा जी ने अपने हुनर को अपना पेशा बनाने का फैसला किया। और उन्होंने अपनी कढ़ाई के हुनर को चुना। लेकिन चूंकि हाथ की कढ़ाई में समय और मेहनत बहुत लगती है। इस लिए उन्होंने एक एंब्रॉयडरी मशीन खरीदी। और फिर उस पर एंब्रॉयडरी बनाना सीखा। किसी ट्रेनर या कोर्स के बिना। और फिर शुरू हो ...

जीत आपकी | Jeet Aapki | Game | Game Story

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    जीत आपकी......... गेम क्या है? गेम ज़िन्दगी है? गेम हम क्यों खेलते हैं? गेम खुशी है? गेम दोस्त है? गेम को कभी ज़िन्दगी का हिस्सा माना जाता था।  बच्चों को गेम खेलने के लिए कहा जाता था। अक्सर बच्चे और बड़े मिलकर भी गेम खेलते थे। वक्त के साथ सब बदल जाता है। यह हम और आप अक्सर सुनते हैं। लेकिन आज हम देखते हैं कि वक्त के साथ चीजें बहुत तेज़ी से बदल रही हैं।  कल गेम क्या था? और क्यों खेलते थे? कल के गेम में खुशी, तन्दुरूस्ती और मां-बाप का साथ था। शाम हुई नहीं कि बच्चे और बड़े सब कहीं मैदान में, घर के आंगन में या छत पर इकट्ठा हो जाते और गेम शुरू हो जाता था। उस वक्त गेम को गेम कम और खेल ज़्यादा कहा जाता था। कभी आई-स्पाई तो कभी कबड्डी तो कभी कुछ, कुछ समझ नहीं आ रहा तो रेस ही कर लेते। इस के इलावा ताश, लूडो, कैरम तो रोज़ का गेम था ही। कुछ नहीं तो चार लोग एक-एक पेपर लेकर बैठ गये। और उस पेपर पर नाम, शहर, खाना, फिल्म टाइटल देते। गेम का नियम यह था कि चारों खेलने वालों में से एक-एक लोग बारी बारी कोई शब्द बोलेंगे और उस शब्द से सबको हर कॉलम में लिखना रहता था। और उसका एक वक्त ह...